परीक्षाओं के परिणाम आते ही अखबार मेरिट में आने
वालों की तस्वीरों से भर जाता है.सारे कोचिंग सेंटर इस
जुगाड़ में लग जाते है की उनकी क्लास से किस किस ने
अच्छे मार्क्स पाए है. सारे स्कूल्स अपने १०० % रिजल्ट
और किसने ९०% से ऊपर पायें है उसके बारे में विज्ञापन
देने लगते है , एसएमएस करने लगते है. पर इस उत्साह के बीच कहीं वे पीछे छुट जाते है , जिन्होंने
कम मार्क्स पायें है या जो फेल हो गए है.कोई कोचिंग
क्लास या स्कूल ये नहीं बताता की उनके यहाँ से ये कम
मार्क्स वाले या फेल विद्यार्थी क्यों निकले ? ऐसे
विद्यार्थियों की हालत से ज़्यादा खराब उनके
पालकों की हालत होती है. उन्हें लगता है जैसे वे ही फेल हो गए हो . अब वे दूसरों को क्या मुंह दिखायेंगे ? उनके वे
रिश्तेदार और दोस्त जो कभी फोन नहीं करते , वे ऐसे
समय ज़रूर फोन करेंगे या कहीं और से पता लगा कर मन
ही मन खुश होते है.
ऐसे विद्यार्थियों को बहुत सारे मानसिक संबल
की ज़रुरत होती है. जिसके लिए सबसे पहले उनके माता पिता को इस दुःख से अलग हट कर सकारात्मक
प्रयास करने में जुटना होगा. किसी भी सामान्य
विद्यार्थी को अगर परीक्षा के तरीके से
सही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाए तो कोई कारण नहीं की वे
फिर से अच्छा परिणाम पा सके. अब आगे
क्या क्या सही कदम उठाने चाहिए वह सोचना चाहिए . विद्यार्थी को किस विषय में कहाँ समस्या है इसे
पालकों को स्वयं समझना होगा या फिर कोई योग्य गुरु
की खोज आवश्यक है.किराए का व्यक्ति ज्ञान नहीं दे
सकता इसलिए स्वयं ही ये प्रयास कर सकें तो बहुत
अच्छा है.
पुरे जीवन की तुलना में एक साल कुछ भी नहीं होता . इसलिए हताशा से ऊपर उठकर फिर से प्रयास करने में
नहीं हिचकना चाहिए.दसवी या बारहवी बोर्ड के
परिणाम आगे चल कर कोई नहीं पूछता . आगे के लिए
किसी ना किसी स्किल डेवलपमेंट पर जोर
देना चाहिए. जिससे की काम में आने वाला ज्ञान
हासिल हो सके.

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